हाई कोर्ट ने दिया झटका ! लाडली बहना योजना को लेकर कांग्रेस नेता पारस सकलेचा की याचिका खारिज, कोर्ट ने कहा- यह शासन का वैधानिक मामला, सुनवाई नहीं हो सकती
मप्र के कांग्रेस नेता पारस सकलेचा को मप्र हाई कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने लाडली बहना योजना के पंजीयन से संबंधित याचिका खारिज कर दी है। सकलेचा अब सुप्रीम कोर्ट की शरण लेंगे।
एसीएन टाइम्स @ इंदौर । मप्र उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने रतलाम के पूर्व महापौर और प्रदेश के कांग्रेस नेता पारस सकलेचा की लाडली बहना योजना के संबंध में दायर याचिका खारिज कर दी है। न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला तथा न्यायाधीश आलोक अवस्थी की खण्डपीठ ने कहा कि, यह शासन का वैधानिक मामला है, इस पर सुनवाई का कोई न्यायोचित कारण नहीं है।
जानकारी के अनुसार कांग्रेस नेता सकलेचा ने लाडली बहना योजना में नए पंजीयन प्रारंभ करने, लाडली बहना को हितलाभ रुपए 3000 प्रति माह देने तथा न्यूनतम उम्र 18 वर्ष एवं अधिकतम उम्र जीवन पर्यंत करने के लिए उच्च न्यायालय में वाद दायर किया था। सकलेचा की ओर से वरिष्ठ अभिभाषक विभोर खंडेलवाल ने न्यायालय से कहा कि मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना में जो पात्र हैं, एवं 20 अगस्त 2023 के बाद यदि 21 वर्ष की उम्र को प्राप्त करती है, तो उसको योजना का हित लाभ नहीं दिया जाना संविधान के अनुच्छेद 14, समानता के अधिकार के विरुद्ध है। किसी सतत प्रवृत्ति की योजना में पंजीकरण को बंद नहीं किया जा सकता है। जब 18 साल में विवाह किया जा सकता है, मतदान किया जा सकता है तो लाडली बहना योजनो के लिए भी न्यूनतम उम्र 21 वर्ष के स्थान पर 18 वर्ष किया जाना चाहिए। याचिका पर सुनवाई न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला तथा न्यायाधीश आलोक अवस्थी की खण्डपीठ ने की।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता का तर्क
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि 20.08.2023 से योजना के अंतर्गत नए पंजीकरण बंद करना, जबकि यह योजना सतत (continuing nature) है, अवैध, मनमाना और भेदभावपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह योजना महिला सशक्तिकरण व आर्थिक स्वतंत्रता के लिए लाई गई थी तथा इसके 1.26 करोड़ से अधिक लाभार्थी हैं। इसके बावजूद, राज्य सरकार द्वारा नए पात्र महिलाओं के लिए ऑनलाइन व ऑफलाइन पंजीकरण बिना किसी वैधानिक आधार के बंद कर दिए गए। यह भी तर्क दिया गया कि समान स्थिति वाली महिलाओं को लाभ से वंचित करना शत्रुतापूर्ण भेदभाव (hostile discrimination) है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। अतः पंजीकरण पुनः प्रारंभ करने, आयु सीमा में संशोधन करने तथा योजना का लाभ सभी महिलाओं को देने हेतु निर्देश मांगा गया।
शासन के अधिवक्ता का तर्क
शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता सुदीप भार्गव एवं प्रद्युम्न कीबे ने न्यायालय के समक्ष सकलेचा की सभी मांग का विरोध करते हुए कहा कि यह सरकार का विशेषाधिकार है, और सरकारी योजना का क्रियान्वयन न्यायालय के हस्तक्षेप का विषय नहीं है। इसे मान्य करते हुए न्यायालय ने सकलेचा की याचिका बर्खास्त कर दी। न्यायालय ने कहा कि इस याचिक पर सुनवाई का कोई न्यायोचित कारण नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की लेंगे शरण
याचिकाकर्ता सकलेचा ने कहा है कि वे उच्च न्यायालय इंदौर के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में वाद दायर करेंगे। सकलेचा के अनुसार मतदान, विवाह सहित कई अधिकार महिलाओं को 18 वर्ष की उम्र में ही मिल जाते हैं, अतः योजनाओं के लाभ के लिए भी 21 वर्ष के बजाय 18 वर्ष की आयु को पात्र माना जाना चाहिए।
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