प्रो. अज़हर हाशमी के जन्मदिवस (13 जनवरी) पर विशेष : "मैं चिता की गोद में भी गीत गाना जानता हूं…" -श्वेता नागर
ख्यात साहित्यकार और राम वाला हिन्दुस्तान चाहने वाले प्रो. अज़हर हाशमी के जन्मदिन 13 जनवरी पर उनके शिष्यों की ओर से व्यक्त कृतज्ञता भरा यह आलेख पढ़ें।
श्वेता नागर
"नाश में निर्माण की वीणा बजाना जानता हूं।
संकटों के मध्य भी मैं मुस्कुराना जानता हूं।
मौत को आना है आए, मुझको उसका भय नहीं।
मैं चिता की गोद में भी गीत गाना जानता हूं।"
ये पंक्तियां साहित्यकार, चिंतक और कवि अज़हर हाशमी जी की हैं। ये केवल काव्य पंक्तियां नहीं हैं बल्कि कह सकते हैं जीवन के अंतिम क्षणों में जिया उनका जीवन दर्शन है। प्रो. हाशमी ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता रहे। दूसरों के भविष्य को पढ़ने वाले हाशमी जी ने अंतिम समय में जब उन्हें घर से अस्पताल के लिए लाया जा रहा था तब उन्होंने स्वयं के लिए भविष्यवाणी करते हुए कह दिया था कि यह उनके जीवन की अंतिम यात्रा रहेगी। 5 जून को जब मैं, स्वयं उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछने अस्पताल गई तब उन्होंने मुझ से कहा कि आज से अधिकतम 4 या 5 दिनों की और मेरी सांसे हैं, और ऐसा ही हुआ।
श्रद्धेय हाशमी सर सूफ़ी परम्परा के संवाहक रहे, और श्रीमद् भगवद गीता के चिंतन को उन्होंने अपने जीवन में उतारा। इसलिए ही वे गीता मनीषी कहे जाते हैं। श्रीमद् भगवद गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षणों को बताते हुए कहते हैं कि- ऐसा व्यक्ति जो जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी शांत और स्थिर रहता है, वही स्थितप्रज्ञ है।

ऐसे ही स्थितप्रज्ञ अवस्था को प्राप्त श्रद्धेय हाशमी सर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की असहनीय पीड़ा से गुजरते हुए भी अपने मन, बुद्धि, मस्तिष्क और भावनाओं को नियंत्रित और स्थिर रख अंतिम समय में भी शिष्यों से ज्ञान, धर्म, दर्शन और साहित्य पर चर्चा करते रहे। स्वयं उनका इलाज करने वाले डॉक्टर्स भी उनके इस आत्मबल को प्रणाम करते हुए कह रहे थे कि कैंसर की इस अंतिम अवस्था में हाशमी जी के शरीर की आंतरिक प्रणाली ने अधिकांशतः काम करना बंद कर दिया है लेकिन यह हमारे लिए भी आश्चर्य का विषय है कि वे कैसे इतनी मानसिक स्थिरता को बनाए रखे हुए हैं। आत्मीयता और अपनत्व का भाव प्रो. अज़हर हाशमी जी के व्यक्तित्व का चुंबकीय गुण था, इसलिए जो भी उनके सम्पर्क में आया फिर वह हमेशा के लिए उनसे जुड़ गया।
इसका प्रमाण हैं हम सब शिष्य, विद्यार्थी तो लंबे समय से उनके सान्निध्य में रहे, इसलिए हम सभी का हाशमी सर के प्रति श्रद्धा भाव और भावनात्मक जुड़ाव स्वाभाविक था, लेकिन हाशमी सर का इलाज करने वाले डॉक्टर्स भी उनका इलाज करते हुए उनके उदारतापूर्ण व्यवहार से ऐसे प्रभावित हुए कि वे भी उनके प्रति श्रद्धा भाव से भर उठे। ऐसे ही हमारे रतलाम शहर के प्रसिद्द डॉक्टर अरुण पुरोहित जो कि हाशमी सर का इलाज कर रहे थे, जब उन्हें जांच रिपोर्ट्स से मालूम हुआ कि हाशमी सर को कैंसर है तब उन्होंने हाशमी सर की इतने समर्पित भाव से सेवा की कि ऐसा लग रहा था वे हाशमी सर के डॉक्टर नहीं बल्कि पुत्र या शिष्य हों। वे हंसते हुए हम सभी से कहते थे कि आप सब तो हाशमी सर के शिष्य हैं, मैं तो उनसे अभी जुड़ा हूं।
10 जून, सुबह लगभग 11.30 बजे का वह मार्मिक दृश्य जब श्रद्धेय हाशमी सर अपनी अंतिम सांसे ले रहे थे, तब डॉ. पुरोहित उन्हें देखने आए। जैसे ही हाशमी सर ने उन्हें देखा अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा लिया। वे कुछ बोल पाने में तो उस समय समर्थ नहीं थे लेकिन उनका भाव साफ झलक रहा था कि वे उन्हें अंतिम बार आशीर्वाद दे रहे हैं, और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। हाशमी सर के इन भावों को कहे बिना डॉ. पुरोहित भी समझ गए और उन्होंने भावुक होकर उन्हें गले लगा लिया। यह मौन संवाद मानो देव और देवदूत के बीच हो रहा था।
हाशमी सर ने अपने जीवन में जो कुछ भी कमाया उसे समाज के लिए ही खर्च किया। कुछ भी संचय नहीं किया। फकीर सा जीवन जिया। इसलिए इलाज के खर्च को लेकर उन्हें चिंता सता रही थी। क्योंकि एक से डेढ़ महीने वे आईसीयू में रहे थे।

तब अपने शिष्यों के लिए जीवन समर्पित करने वाले हाशमी सर के लिए उनके शिष्य, और जिस अस्पताल में वे उपचाररत थे उस अस्पताल के संचालक श्री राजेश मूणत जी ने भी पूरे समर्पण भाव से अपने शिष्य धर्म का निर्वाह करते हुए हाशमी सर को निश्चिंत करते हुए कहा कि मैं जानता हूं आपने अपना पूरा जीवन दूसरों के लिए जिया। आपका मेरे अस्पताल में इलाज करवाना मेरा सौभाग्य है, क्योंकि आप जैसे सूफ़ी संत का मेरे यहां आना हुआ है। आप किसी प्रकार की चिंता न करें, बस यहां से स्वस्थ होकर जाइए।"
शिष्यों के साथ-साथ अपने परिवार के प्रति भी हाशमी सर ने अपने दायित्वों का पूर्ण निर्वाह किया। उनके भाई श्री मुख़्तार हाशमी और श्री मजहर हाशमी जी ने भी अंतिम समय में अपने बड़े भाई की निष्ठा भाव से सेवा सुश्रुषा की।
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हाशमी सर की शिष्या आदरणीय डॉ. प्रवीणा दवेसर ने अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता भाव को व्यक्त करते हुए ‘बलिहारी गुरु’ आपकी पुस्तक प्रकाशित करवाई जिसमें हाशमी सर के शिष्यों ने अपने गुरु के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपने विचारों को व्यक्त किया। इसके साथ ही ‘रूहानियत’ कार्यक्रम के माध्यम से उनके गीतों की संगीतमय प्रस्तुति भी दी गई। उनकी एक और शिष्य नंदिनी सक्सेना द्वारा अपने गुरु की स्मृति में 7 दिवसीय भागवत कथा का आयोजन किया गया। इससे समाज में सांप्रदायिक सद्भाव और सौहार्द का संदेश प्रसारित हुआ।

अनिला कंवर, सतीश त्रिपाठी, तुषार कोठारी, हेमंत भट्ट, नीरज कुमार शुक्ला, विजय सिंह रघुवंशी, आरिफ कुरैशी सहित अनेक शिष्यों ने अंतिम समय तक अपने गुरु श्रद्धेय हाशमी सर के लिए समर्पित भाव से अपने दायित्व का निर्वाह किया। हाशमी सर और उनके शिष्यों का आत्मीय संबंध भारतीय संस्कृति की गुरु शिष्य परम्परा का आदर्श उदाहरण है।

आज के इस दौर में जहां संबंध स्वार्थ के धागों में गुंथे होते हैं, वहीं श्रद्धेय हाशमी सर और उनसे जुड़े उनके शुभचिंतकों, शिष्यों के बीच संबंध विश्वास, श्रद्धा और स्नेह की पवित्र डोरी से बंधे हैं।

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