विचारणनीय प्रश्न ! माफियाओं के इस दौर में मीडियाकर्मियों के लिए आचार संहिता क्यों जरूरी है ?

मौजूदा दौर में मीडिया के बदलते स्वरूप पर चिंता जताता और मीडियाकर्मियों के लिए आचार संहिता की आवश्यकता को रेखांकित करता वरिष्ठ पत्रकार शरद जोशी का यह आलेख एक बार अवश्य पढ़ें।

विचारणनीय प्रश्न ! माफियाओं के इस दौर में मीडियाकर्मियों के लिए आचार संहिता क्यों जरूरी है ?
शरद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार।

शरद जोशी

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला मीडिया आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। जहाँ कभी पत्रकारिता में सत्ता से सवाल करने का साहस थी, वहाँ आज कई मंचों पर वह सत्ता की भाषा बोलती दिखाई देने लगी है।

ऐसे समय में मीडियाकर्मियों के लिए आचार संहिता (Code of Conduct) की आवश्यकता औपचारिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा की अनिवार्य शर्त बन चुकी है। आज समाचार सिर्फ सूचना नहीं रहे, वे प्रोडक्ट बन गए हैं। टीआरपी, व्यूज और लाइक्स की दौड़ में कई बार सत्य पीछे छूट जाता है और सनसनी आगे निकल जाती है। अधूरी, अपुष्ट और भ्रामक खबरें समाज में भ्रम, डर और तनाव पैदा कर रही हैं।

ऐसी स्थितियों में आचार संहिता पत्रकार को यह याद दिलाती है कि उसका पहला दायित्व जनता के प्रति है, न कि किसी सत्ता, दल या विज्ञापनदाता के प्रति। फेक न्यूज आज केवल अफवाह नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन का हथियार बन चुकी है। भीड़ हिंसा, सांप्रदायिक तनाव और चरित्र हनन जैसी घटनाओं की जड़ में कई बार मीडिया की गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग रही है।

आचार संहिता पत्रकार को बाध्य करती है कि वह तथ्य जांचे, दोनों पक्ष सुने और पुष्टि के बिना कोई सामग्री प्रसारित न करे। रिपोर्टिंग के नाम पर पीड़ितों की तस्वीरें दिखाना, बच्चों और महिलाओं की पहचान उजागर करना तथा निजी दुख को सार्वजनिक तमाशा बना देना यह सब मानवीय गरिमा पर हमला है। आचार संहिता पीड़ितों की निजता और सम्मान की रक्षा की स्पष्ट सीमा तय करती है।

आज मीडिया पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव भी बढ़े हैं। जिस प्रकार धनबल के सहारे कतिपय लोग सत्ता और संगठन के  द्वार पंहुच रहे है उसी तरह  मीडिया  जगत में भी इन्ही लोगों का बोल बाला बडता जा रहा है।

इसी तरह इनके साथ ही विभिन्न माफियाओं की घुसपैठ भी मीडिया और मीडिया संगठनों में बढ़ रही है जिससे ईमानदार और जनहित का संकल्प लेकर कार्य करने वाले मीडियाकर्मियों में हताशा और निराशा भाव उत्पन्न हो रहा है। यह लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए घातक ही सिद्ध होगा। इस पर गंभीरत से चिंतन मनन करने की आवश्यकता है।

यह भी गौर करने की बात है कि आज सरकारी विज्ञापन, कॉरपोरेट फंडिंग और सत्ता समीकरण कई बार खबर की दिशा तय करते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

आचार संहिता पत्रकार को नैतिक कवच देती है ताकि वह दबाव में नहीं, सिद्धांतों पर काम कर सके। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आचार संहिता जवाबदेही तय करती है। गलत, भ्रामक और समाज को नुकसान पहुँचाने वाली पत्रकारिता पर कार्रवाई संभव हो यही लोकतंत्र की बुनियाद है। आचार संहिता मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता की गारंटी है। क्योंकि बिना मर्यादा के स्वतंत्रता, अराजकता बन जाती है।

(लेखक रतलाम के वरिष्ठ पत्रकार, लेखक हैं। आप रतलाम प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं और सहकारिता सहित तमाम संगठनों में प्रमुख पदों का दायित्व संभाल चुके हैं)